देवेश मेरे दोस्त है, वे ङिजनी और बच्चों लिये स्क्रिप्ट लिखते है, जर्मन , चायनीज फिल्म महोत्सव में उनकी शोर्ट फिल्में दिखाई जा चुकी है। इंटरनेशनल फिल्म महोत्सव मेंविधवाओं के ऊपर बनीशोर्ट फिल्म के लिए उन्हें पुरस्कार मिला है। उनकी ये कविता आप भी पढिये
बेरोजगार किसी को मत पुकारो
बेरोजगार किसी का नाम नहीं होता
बेह्तासा भागती जिंदगी में
पटरी से गिरकर रूक जाना
चौराहों पर थककर टिक जाना
किसी नौजवान का अरमान नही होता
दोपहरौं से शाम तलक
अखबार को पढना
रात रात भर जागकर
जीवन के ताने बाने में
खुशियों के ख्याब सजोना
फिर सुबह कि दस्तक पर
उमींदों के बस्ते लेकर
हर मंदिर पर हाथ जोङकर
मंजिल की रहूँ पर चलते जाना
शायद बेरोजगारों को कम नही होता
एक लफ्ज उन्हें हम देकर नया
नाकामी की सजा उतारें
गुमनामी से बचा लो उसे
बेरोजगार किसी को मत...........
Sunday, December 16, 2007
Saturday, December 8, 2007
कामना
हर कामना में विजय का आभास लिए
अपने मन में एक नया विश्वास लिए
है जंग बहुत लंबी
दिल में जीतने की उम्मीद भरी
कभी लगती है डगर सपनों वाली है
माना स्वपन की भाषा खुशबू सही
पर जिंदगी की भाषा तो निर्मल पानी है
दोनो ही भाषा है अकल्पनीय, अकथित
लेकिन दीपक कि भाषा तो ये ही जाने
कि अधेरें में मुझे रोशनी लानी है
अनुराग
अपने मन में एक नया विश्वास लिए
है जंग बहुत लंबी
दिल में जीतने की उम्मीद भरी
कभी लगती है डगर सपनों वाली है
माना स्वपन की भाषा खुशबू सही
पर जिंदगी की भाषा तो निर्मल पानी है
दोनो ही भाषा है अकल्पनीय, अकथित
लेकिन दीपक कि भाषा तो ये ही जाने
कि अधेरें में मुझे रोशनी लानी है
अनुराग
अरुण आदित्य

युवा कवि अरुण आदित्य के बारे में सुना तो था, पड़ा भी था। पर उनसे मिलने के बाद उन्हें और उनकी कविताओं को एक अलग नज़रिये से देखने का मौका मिला। उनकी यह कविता आपभी पढिए
इंटरव्यू
आपकी जिन्दगी का सबसे बड़ा स्वपन क्या है
आसान सा सवाल पर मै हड़बड़ा गया
घबराहट मे हो गया पसीना- पसीना,
पर याद नही आया अपना सबसे बड़ा सपना
पर याद नही आया अपना सबसे बड़ा सपना
याद आता भी कैसे
मैंने अभी तक सोचा ही नही था
कि क्या है मेरा सबसे बड़ा स्वपन
मैं सोचता रहा
सोचते सोचते आ गया बाहर
कि यह सिर्फ़ मेरी बात नही
देश मे है ऐसे मार तमाम लोग
दूसरो के सपनो को चमकाते हुए
जिन्हे मौका ही नही मिलता
सोच सके अपने लिये कोई सपना
अपने इस सोच पर मुगध होता हुआ तैयार किया अगले इंटरव्यू का जवाब
मेरा सपना है कि देख सकू एक सपना जिसे कह सकू अपना
जवाब हो चुका है तैयार
पर अब भी एक पेंच है कि जिन्दगी
क्या एक ही सवाल पूछेगी हर बार
Friday, December 7, 2007
मैं पत्रकार बन गया
मैंने कभी पैसा कमाने की कोशिश नहीं की
क्योंकि मुझे पता है की सिक्कों की खनखनाहट आदमी को बहरा कर देती है
मैंने कभी दोस्त बनाने की कोशिश नहीं की
क्योंकि मुझे पता है कि दोस्त भावनाएं पैदा कर देते है
मैंने कभी रिश्ते बनाने की कोशिश नहीं की
क्योंकि मुझे पता है कि रिश्ते उसूल तोड़ देते है
मैंने कभी हवा के साथ चलने की कोशिश नहीं की
क्योंकि मुझे पता है कि हवाएं कुछ दूर पर दिशाएं बदल देती है
पैसा, दोस्त,रिश्तों, हवाओं से में बच गया
पर समय का दस्तूर देखिए मैं पत्रकार बन गया
अनुराग
क्योंकि मुझे पता है की सिक्कों की खनखनाहट आदमी को बहरा कर देती है
मैंने कभी दोस्त बनाने की कोशिश नहीं की
क्योंकि मुझे पता है कि दोस्त भावनाएं पैदा कर देते है
मैंने कभी रिश्ते बनाने की कोशिश नहीं की
क्योंकि मुझे पता है कि रिश्ते उसूल तोड़ देते है
मैंने कभी हवा के साथ चलने की कोशिश नहीं की
क्योंकि मुझे पता है कि हवाएं कुछ दूर पर दिशाएं बदल देती है
पैसा, दोस्त,रिश्तों, हवाओं से में बच गया
पर समय का दस्तूर देखिए मैं पत्रकार बन गया
अनुराग
Monday, December 3, 2007
Friday, November 30, 2007
विवेक भटनागर की ग़ज़लें
विवेक भटनागर
शांत वाणी और मधुर स्वाभाव के विवेक भटनागर अमर उजाला में सम्पादकीय टीम के सम्मानित सदस्य हैं, यह शख्सियत कविता और ग़ज़ल में माहिर है, इनकी रचनाओ में स्वस्थ परंपरा और ताजगी का एहसास तो है ही, गज़ब कि संवेदनशीलता भी है थोडे में कहा जाये, तो कम बोलने वाली वजनी शख्सियत
हम गधे हैं तो गधा ही रहने दो, क्या हर्ज़ है
आपसे हर हाल में बेहतर हैं, आदाब अर्ज़ है
क्यो हमे इंसान बनाने के लिए बेचैन हैं
हम गधे हैं, कैसे समझे आपकी क्या गरज हैं
आज का संगीत सुनकर हम भी खुद शर्मा गए
रेंकने की क्या अनोखी संशोधित तर्ज़ है
हम गधे हैं मगर इतने गधे भी तो नहीं
ये न समझे एक सेहतमंद को क्या मर्ज़ है
शांत वाणी और मधुर स्वाभाव के विवेक भटनागर अमर उजाला में सम्पादकीय टीम के सम्मानित सदस्य हैं, यह शख्सियत कविता और ग़ज़ल में माहिर है, इनकी रचनाओ में स्वस्थ परंपरा और ताजगी का एहसास तो है ही, गज़ब कि संवेदनशीलता भी है थोडे में कहा जाये, तो कम बोलने वाली वजनी शख्सियत
हम गधे हैं तो गधा ही रहने दो, क्या हर्ज़ है
आपसे हर हाल में बेहतर हैं, आदाब अर्ज़ है
क्यो हमे इंसान बनाने के लिए बेचैन हैं
हम गधे हैं, कैसे समझे आपकी क्या गरज हैं
आज का संगीत सुनकर हम भी खुद शर्मा गए
रेंकने की क्या अनोखी संशोधित तर्ज़ है
हम गधे हैं मगर इतने गधे भी तो नहीं
ये न समझे एक सेहतमंद को क्या मर्ज़ है
Wednesday, November 28, 2007
खंडहर होते सपने
पत्रकारिता की दहलीज़ पर जब कोई नौनिहाल जोश, जज्बे और उम्मीद के साथ कदम रखता है, तो शुरुआत मे उसे ये दुनिया हसीं लगती है, लेकिन समय बीतने के साथ हकीकते खुद सामने आ जाती है, उसके सपने किसी रेत के महल की तरह भरभरा कर गिर जाते है
बडे लगन और त्याग से पढाया करते थे
अनुशासन और आदर्श की बातें बताया करते थे
उसने एक बडे शिक्षण संस्थान मी दाखिला लिया
लोग कहने लगे चलो जीवन भर कष्ट सहा लेकिन बच्चों को बना दिया
अम्मा लगी सपने बुनने बाबू जी लगे दिन गिनने
उसकी भी होने लगी बड़ी बड़ी बाते लंबी लंबी मुलाकातें
साल बीता तो पता चला तो ठगे गए
बड़ी बड़ी बातें और वादे ही उसके साथ दगे गए
उमींदों की मंजिल बिखर गयी सपनो का खंडहर हो गया
अम्मा बाबू जी के सपनो का महल उसकी आँखों के सामने बहने लगा
क्या दे जवाब कैसे करू खंडहर होते सपनो को पूरा
असहाय असमंजस की स्थिति मे हूँ अजब परिस्थति मे हूँ
लोग कहते है उसे कि बड़ी प्रतिभा है बड़ा मेहनती है इस पर करता है गहन चिंतन तो होने लगती है चिंता
कुछ अपने लोग समझाते है उसे बेटा चिंता मत करो, उम्मीद रखो
तो कुछ अपने लोग समझाते है बड़ी बड़ी बाते और कहते है कान्टेक्ट मे रहो
दूसरो की सुनकर सह लेता था वो लेकिन अम्मा बाबू जी की उमींदों ने दिल को भेद दिया
क्योंकि उनके सपनो मे ही उसके सपने है
कुछ लोग सफल हुए क्योंकि वे उनके अपने है
जीनोहने अपनी पैठ बना रखी है इंडस्ट्री मे
वो तो आउट हो गया पहली कमेंट्री मे
कुछ लोगो को यह कविता भा गयी
कुछ लोगो के दिल मे समां गयी
किसी के दिल का दर्द तो किसी के लिए मौसम सर्द
यह अकेले उसकी नही कहानी है आज उसकी तो कल किसी और कि जुबानी है
बडे लगन और त्याग से पढाया करते थे
अनुशासन और आदर्श की बातें बताया करते थे
उसने एक बडे शिक्षण संस्थान मी दाखिला लिया
लोग कहने लगे चलो जीवन भर कष्ट सहा लेकिन बच्चों को बना दिया
अम्मा लगी सपने बुनने बाबू जी लगे दिन गिनने
उसकी भी होने लगी बड़ी बड़ी बाते लंबी लंबी मुलाकातें
साल बीता तो पता चला तो ठगे गए
बड़ी बड़ी बातें और वादे ही उसके साथ दगे गए
उमींदों की मंजिल बिखर गयी सपनो का खंडहर हो गया
अम्मा बाबू जी के सपनो का महल उसकी आँखों के सामने बहने लगा
क्या दे जवाब कैसे करू खंडहर होते सपनो को पूरा
असहाय असमंजस की स्थिति मे हूँ अजब परिस्थति मे हूँ
लोग कहते है उसे कि बड़ी प्रतिभा है बड़ा मेहनती है इस पर करता है गहन चिंतन तो होने लगती है चिंता
कुछ अपने लोग समझाते है उसे बेटा चिंता मत करो, उम्मीद रखो
तो कुछ अपने लोग समझाते है बड़ी बड़ी बाते और कहते है कान्टेक्ट मे रहो
दूसरो की सुनकर सह लेता था वो लेकिन अम्मा बाबू जी की उमींदों ने दिल को भेद दिया
क्योंकि उनके सपनो मे ही उसके सपने है
कुछ लोग सफल हुए क्योंकि वे उनके अपने है
जीनोहने अपनी पैठ बना रखी है इंडस्ट्री मे
वो तो आउट हो गया पहली कमेंट्री मे
कुछ लोगो को यह कविता भा गयी
कुछ लोगो के दिल मे समां गयी
किसी के दिल का दर्द तो किसी के लिए मौसम सर्द
यह अकेले उसकी नही कहानी है आज उसकी तो कल किसी और कि जुबानी है
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